"सड़क के गढ्ढे की आत्मकथा"
एक दिन, चलाते हुए कार,
बीच सड़क मैं हुआ बेजार
देखा एक "गढ्ढा", मैं कुछ चौंका
अरे ये!!! यहाँ, कब, कैसे,?
अचानक गढ्ढे से आवाज़ आई
चाहे-अनचाहे, जाने-अनजाने
हो बरसाती दया, या ठेकेदार की मौज
हुआ मेरा जन्म कल ही|
गाड़ियों का स्पर्श, और बारिश
ने दिया भरपूर पोषण
हो गया रातों रात इतना विकसित
इग्नोर करना अब तो नामुमकिन||
भला तुम कहाँ रुकते, सुनने मेरी कथा
निकल जाते बेखयाल-बेसूध
रहते थे आसमान में, करते थे हवा से बातें
धरती पर आए, सड़क से रूबरू हुए तुम
वो देखो, मेरा सहारा ले पार करते
यातायात रूपी दरिया असंख्य
सामाजिक सहयोग में भी हूँ प्रत्यनरत
फिर बोला, ये ना सोच मेरा वजूद नहीं
फ़रारी के ड्राइवर को भी ज़मीन पर ला दूँगा
पैदल को भी कार से जितवा दूँगा
बाहर ला दूँगा गाड़ी की सारी कमज़ोरी
करवा दूँगा ब्रेक, क्लच, एंजिन, सॉकेर्स
सबकी जाँच बिन मजदूरी
वो देखो आ रहा ट्र्क बड़ा तनकर
सीखा दूँगा मज़ा उसको भी जमकर
टू, थ्री, हो या हो फोर व्हीलर
मेरे लिए सब बराबर
नही करता भेद, चपरासी हो या अफ़सर
नही हूँ अकेला, ज़मात मेरी पूरी आ जाएगी
फिर तो सड़क से लेकर संसद में धूम मच जाएगी
आएँगे मेरे दर्शन, नेता अफ़सर, मंत्रीगन
जिनको तरसते असंख्य जन
जाते-जाते भी दूँगा रोज़गार
टेबल नीचे और ऊपर
"गढ्ढा" अमर है, सिर्फ़ जगह बदलती है
पुनर्जन्म जन्म लूँगा, कल किसी और सड़क
यही तो है चलन आत्मा-शरीरों के लिए
इतना कह, "गढ्ढे" ने चुप साध ली
एक नयी अनभूति साथ मैंने अपनी राह ली||