Saturday, September 21, 2013

"मैं"


मैं कौन हूँ?
क्या हूँ मैं?
क्या बनना चाहता हूँ?
अभी हैं शेष समझाना खुद को,
शेष है जब  खुद को समझना,
तो दूसरों को समझाना
हैं और भी मुश्किल

पर इस दुनिया में, जरूरत है
हर किसी को एक आवरण की
जो "मैं" को पहनाया जा सके
"मैं" को समझाने के लिए
जो ढांप लेता आपके उस "मैं" को
और बन जाता है असल "मैं"  

जरूरत भी है उस असल "मैं"
को बचा सहेज कर रखने की
इसी वजह मुझे भी तलाश है
एक आवरण की, जो "मैं" को ढांप सके
बचा सके उस असल "मैं" को
कभी फुरसत में समझाने समझाने के लिए ॥

Wednesday, September 11, 2013


"सड़क के गढ्ढे की आत्मकथा" 
 
एक दिन, चलाते हुए कार, 
बीच सड़क मैं हुआ बेजार  
देखा एक "गढ्ढा", मैं कुछ चौंका 
अरे ये!!! यहाँ, कब, कैसे,? 
अचानक गढ्ढे से आवाज़ आई  
चाहे-अनचाहे, जाने-अनजाने 
हो बरसाती दया, या ठेकेदार की मौज 
हुआ मेरा जन्म कल ही| 
 
गाड़ियों का स्पर्श, और बारिश  
ने दिया भरपूर पोषण 
हो गया रातों रात इतना विकसित 
इग्नोर करना अब तो नामुमकिन|| 
 
भला तुम कहाँ रुकते, सुनने मेरी कथा 
निकल जाते बेखयाल-बेसूध 
रहते थे आसमान में, करते थे हवा से बातें  
धरती पर आए, सड़क से रूबरू हुए तुम 
वो देखो, मेरा सहारा ले पार करते 
यातायात रूपी दरिया असंख्य  
सामाजिक सहयोग में भी हूँ प्रत्यनरत  
 
फिर बोला, ये ना सोच मेरा वजूद नहीं 
फ़रारी के ड्राइव को भी ज़मीन पर ला दूँगा 
पैदल को भी कार से जितवा दूँगा 
बाहर ला दूँगा गाड़ी की सारी कमज़ोरी 
करवा दूँगा ब्रेक, क्लच, एंजिन, सॉकेर्स 
सबकी जाँच बिन मजदूरी 
 
वो देखो रहा ट्र्क बड़ा तनकर 
सीखा दूँगा मज़ा उसको भी जमकर 
टू, थ्री, हो या हो फोर व्हीलर  
मेरे लिए सब बराबर 
नही करता भेद, चपरासी हो या अफ़सर 
 
नही हूँ अकेला, ज़मात मेरी पूरी जाएगी 
फिर तो सड़क से लेकर संसद में धूम मच जाएगी 
आएँगे मेरे दर्शन, नेता अफ़सर, मंत्री  
जिनको तरसते असंख्य  
जाते-जाते भी दूँगा रोज़गार 
टेबल नीचे और ऊपर 
"गढ्ढा" अमर है, सिर्फ़ जगह बदलती है 
पुनर्जन्म जन्म लूँगा, कल किसी और सड़क 
यही तो है चलन आत्मा-शरीरों के लिए 
 
इतना कह, "गढ्ढे" ने चुप साध ली 
एक नयी अनभूति साथ मैंने अपनी राह ली|| 

 

Monday, September 9, 2013


" रखवाले" 


 
जब मैं राजधानी एक्सप्रेस से वापस लौट रहा था, तो रास्ते में आने वाली नदियों को देखना एक सुखद अनुभव रहता है| उस पर नदी अगर साफ हो तो बात ही कुछ और है| पर यहाँ एक बात और गौर करने वाली थी की नदी के किनारों पर बड़े बड़े उद्योग थे, और उनका ढेर सारा गंदाला पानी सीधे नदी में आकर ही गिर रहा था| इतना बड़ा अंधेर, लगता है यहाँ का कोई मालिक नहीं है, बस संसाधनों की अंधाधुंध लूट जारी है| और ह्मारे देश में तो ये बड़ी आम बात है|ये बात अलग हैकी सबसे अधिक धार्मिक जनसंख्या इस देश में ही है| पर ये तभी संभव हैं जब रखवाला सो गया है.  
बगीचे के रखवाले,  
कहाँ सो गया? कहीं खो गया? 
की बेसूध लूट मची, पर तुझे खबर ही नही, 
तेरी सुंदर नादिया को तो शहर और उद्योग पी गये, 
कर दिया तब्दील, नाले मात्र में 
पूरी कायानत जैसे गुलाम हो गयी 
दो पेर वाले जानवर की 
पेड़ से लेकर समस्त प्राणी जगत  
बन गया मात्र एक उपयोग की वस्तु भर 
तू बस सोता रहा 
या संभवत पसंद गयी चापलूसियान  
या बंद हुई सारी आवाज़ें दौलत की खंकार में 
पर सुना है तेरे शहर में इसकी कोई कीमत नही 
 
ये बगीचा तो दिखा, पर तू दिखा, 
इस पर्वत की छोटी पर, नदी के मुहाने में, 
आसमान में, सब और आता पता  
या हो गया क़ैद, आदमकद दीवारों में,  
किताबों में, शब्दों में, 
या नहीं देख पाता चालाकियाँ  
 
जंगल के जंगल खा गये 
ताल के ताल पी गये 
समुंदर भर मच्चली खा गये 
तुझे पता तक ना चला 
 
तेरे नाम पर काटा कितने  
पेड़ों, जानवरों, इंसानों को, 
लूटे जाते सारी कायानत  
वजह-बेवजह 
होशमंदा-बेपरवाह 
अदद तेरी खामोशी के साए में 
तेरी इच्छा अनिच्छा की नासमझी में 
अब बस!!!! 
तू व्यक्त हो, जाग्रत हो, स्पष्ट हो|||