Saturday, March 22, 2014

बात कुछ और है

                                             

सुबह ऑफिस कि चाय और गपशप के बीच
एक मित्र ने वाकया सुनाया
अपनी कार ड्राइविंग के संघर्षों का,
एक नया मजमून सुनाया
हुआ कुछ यूँ, कि इनकी कार ने
नजरें बचा के चुपचाप
दूसरी गाड़ी के साइड मिरर पर
"किस्स" कर लिया
फिर तो सरे राह हंगामा हो गया
वो दूसरी कार वाला, पूरा आगबबूला हो गया
पर राहत की बात थी
जुर्मे-निशानदेही नहीं थी
 इसलिए मामला कम संगीन था
पर दूसरी कार का मालिक, बेचैन था
वो बस कुछ करना चाहता था
कुछ नहीं तो दो-चार हाथ जमाना चाहता था
हमारे मित्र ने अपना अज्ञान स्वीकार किया
पर उसने ऐसे खाली हाथ जाने ना दिया,
और गलियों के सम्मिश्रण के साथ अपना हर्ज़ाना लिया

दोस्तो, ऐसे वाकये हर रोज होते हैं
राह चलते, ऑफ़िस मैं, घर मैं, कतारों मैं
हम खीजते हैं, चीख़ते हैं, झुंझलाते हैं
बहुत कुछ पाने के बाद,
बस खाली-पन लिए रहते हैं
हर दिन, हर पल एक नयी दौड़
और  दूसरे को पछाड़ देने में लग जाते हैं

हम बचपन मैं  सुनते थे एक हास्य
"दो दोस्त, जंगल , और अचानक सामने शेर,
एक दोस्त जूते कसता हुआ, तैयारी करता पछाड़ाने की
दूसरे दोस्त को, ...."
उस हास्य का तो पता नहीं क्या हश्र हुआ
पर यहाँ असल जिंदगी मैं, ऐसे शेर हैं
जो दोनों दोस्तों को ही अपना शिकार बना डालते हैं
उनकी आपसी स्पर्धा का मज़ा उठाते हैं