"ओ रखवाले"
जब मैं राजधानी एक्सप्रेस से वापस लौट रहा था, तो रास्ते में आने वाली नदियों को देखना एक सुखद अनुभव रहता है| उस पर नदी अगर साफ हो तो बात ही कुछ और है| पर यहाँ एक बात और गौर करने वाली थी की नदी के किनारों पर बड़े बड़े उद्योग थे, और उनका ढेर सारा गंदाला पानी सीधे नदी में आकर ही गिर रहा था| इतना बड़ा अंधेर, लगता है यहाँ का कोई मालिक नहीं है, बस संसाधनों की अंधाधुंध लूट जारी है| और ह्मारे देश में तो ये बड़ी आम बात है|ये बात अलग हैकी सबसे अधिक धार्मिक जनसंख्या इस देश में ही है| पर ये तभी संभव हैं जब रखवाला सो गया है.
ओ बगीचे के रखवाले,
कहाँ सो गया? कहीं खो गया?
की बेसूध लूट मची, पर तुझे खबर ही नही,
तेरी सुंदर नादिया को तो शहर और उद्योग पी गये,
कर दिया तब्दील, नाले मात्र में
पूरी कायानत जैसे गुलाम हो गयी
दो पेर वाले जानवर की
पेड़ से लेकर समस्त प्राणी जगत
बन गया मात्र एक उपयोग की वस्तु भर
तू बस सोता रहा
या संभवत पसंद आ गयी चापलूसियान
या बंद हुई सारी आवाज़ें दौलत की खंकार में
पर सुना है तेरे शहर में इसकी कोई कीमत नही
ये बगीचा तो दिखा, पर तू न दिखा,
न इस पर्वत की छोटी पर, न नदी के मुहाने में,
न आसमान में, सब और आता न पता
या हो गया क़ैद, आदमकद दीवारों में,
किताबों में, शब्दों में,
या नहीं देख पाता चालाकियाँ
जंगल के जंगल खा गये
ताल के ताल पी गये
समुंदर भर मच्चली खा गये
तुझे पता तक ना चला
तेरे नाम पर काटा कितने
पेड़ों, जानवरों, इंसानों को,
लूटे जाते सारी कायानत
वजह-बेवजह
होशमंदा-बेपरवाह
अदद तेरी खामोशी के साए में
तेरी इच्छा अनिच्छा की नासमझी में
अब बस!!!!
तू व्यक्त हो, जाग्रत हो, स्पष्ट हो|||

सचमुच अब उसके साकार स्पष्ट होने की जरूरत है । अच्छी शुरुआत है । जारी रहनी चाहिये ।
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