Thursday, January 30, 2014

"कुछ देर लिए ही"

"कुछ देर लिए ही"

आज की भाग-दौड़ भरे इस समय मैं 
अचानक याद आया,
कि आज "पुण्य-तिथि", बापू की 

आज के ही दिन ३०-जनवरी-१९४८ को 
मारी थी गोली, एक
विचार को 
या कहें एक व्यक्ति को 
या एक विचारधारा को 
जिसे हम सब जानते, गांधीजी के नाम से 

आज हमारे जीवन मैं, कितनी जरूरत 
कितनी महत्ता, इस सब की 
जब हम अपनी महत्ता को भूल 
तोलते पदों और पैसे के माध्यम से अपने आप को 

क्या कितना, अपने आप से दूर जाते 
और, दुरूह करते अपनी राह 
अंदर अब देखने का फैशन चंद फकीरों के नाम 
अब तो बस टीवी के जरिये "दूर-दर्शन"
क्या बेवजह ट्रैफिक-जाम नहीं करते साबित ये सब ॥ 

शायद हमें भी कुछ समय रुकने कि जरूरत है 
सोचने की,
गांधी-वाद, गांधी-दर्शन क्या "बॉली-वुड" के लिए ?
हमारे अपने जीवन में, कितना प्रासंगिक 
सोचें हम भी कुछ देर के लिए ही ॥ 

1 comment:

  1. सचमुच गान्धी जी अब लोगों के लिये अप्रासंगिक होगए हैं लेकिन बेशक यह वास्तविकता से दूर होना भी है । सच तो यह है कि गान्धी जी कभी अप्रासंगिक नही होसकते । जब भी आत्मविश्वास और संवेदना की बात होगी ,जीवन के यथार्थ की बात होगी ,सादगी और सच्चाई की बात होगी , आत्मशक्ति ,संयम और धैर्य की बात होगी और मानवता की बात होगी सबसे पहले बापू ही सामने होंगे । बहुत ही अच्छी कविता है प्रशान्त ।

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