"मैं"
मैं कौन हूँ?
क्या हूँ मैं?
क्या बनना चाहता हूँ?
अभी हैं शेष समझाना खुद को,
शेष है जब खुद को समझना,
तो दूसरों को समझाना
हैं और भी मुश्किल
पर इस दुनिया में, जरूरत है
हर किसी को एक आवरण की
जो "मैं" को पहनाया जा सके
"मैं" को समझाने के लिए
जो ढांप लेता आपके उस "मैं" को
और बन जाता है असल "मैं"
जरूरत भी है उस असल "मैं"
को बचा सहेज कर रखने की
इसी वजह मुझे भी तलाश है
एक आवरण की, जो "मैं" को ढांप सके
बचा सके उस असल "मैं" को
कभी फुरसत में समझाने समझाने के लिए ॥
परसाई जी ने इसे यूँ कहा है---"छल का धृतराष्ट्र आलिंगन करे तो पुतला आगे बढाना चाहिये ।"
ReplyDeleteदरअसल यह उस 'मैं' को ही बचाने का प्रयास है ।